Sant Shiromani Paramhans Lakshmi Nath Goswamiसंत शिरोमणि परमहंस लक्ष्मीनाथ गोस्वामी

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भक्तों के अनुभव


मृत गौ का पुर्नजन्म

सर्प का विष तीन प्रकार से उतारा जाता है- (1) मन्त्र से (2) औषधि से (3) योग बल से।

बनगाँव के श्री कारी खाँ ने स्वामी जी को दूध पीने के लिए एक गाय दी थी। नित्य प्रति इस गाय का दूध बाबा जी को भेज दिया करते थे। एक दिन दूध नहीं पहुँचा। बाबा जी ने निशिचत समय का अतिक्रमण देख प्राप्त वस्तुओं से अपनी बुभुक्षा मिटा ली। गौ को सर्प ने काट लिया था। उपचार किया गया किन्तु विफल रहा। अन्ततोगत्वा गाय मर गर्इ। श्री कारी खाँ ने आकर बाबाजी से सारा वृतान्त कह सुनाया। बाबाजी ने चौंक कर कहा- ''क्या गाय, सर्प के काटने से मर गर्इ? श्री कारी खाँ ने कहा- हाँ। बाबा जी ने उदास होकर पूछा- ''क्या चमार उठा कर ले गया। श्री कारी खाँ ने कहा ''निशिचत कहा नहीं जा सकता। बाबा जी ने कहा- ''शीर्घता से जाओ और गाय को ले जाने से रोको। मैं अतिशीघ्र आता हूँ। बाबा जी पाँव में खड़ाँऊ और हाथ में लाठी लेकर पहुँच गये। कुछ काल खड़े देखते रहे और बाद में अपनी छड़ी से उठाने का उपक्रम किये। छड़ी के स्पर्श ही से गौ उठ गर्इ।

उपसिथत लोग बाबा जी की अदभूत शकित देखकर चकित रह गये। बाबा जी ने कारी खाँ से कहा- ''कुछ देर तक खाने नहीं देना। पहले दूध को स्तन से निचोर कर फेंक देना, कोर्इ पीने न पावेंं सब ठीक हो जायेगा। यह कह कर बाबा जी कुटी पर चले गये।


ठेंगहा घाट पैदल बाट बना

चिनगारी तृण के ढेरों में कब तक छिपी रह सकती है। बाबाजी की पर्ण कुटी की जगह ठाकुरवारी स्थापित हो चुकी थी। भजनियाँ, पुजारी तथा अन्य कार्यवाहक लोग रहने लगे थे। पथिकों को ठहरने के लिये पथिकाश्रम का निर्माण हो चुका था। सबों के लिए भंडार मुक्त था एवं किसी चीज की कमी नहीं रहती थी। रिऋि-सिद्धि का शुभागमन हो चुका था। योग की अनेकों सिद्धियाँ प्राप्त कर चुके थे।

बाबा जी की महिमा एवं योग चमत्कार सुन-सून कर उस समय उनको अपने यहाँ बुलाने की लोगों में होड़ लग गर्इ थी। एक सज्जन के साथ बाबा जी दरभंगा जा रहे थे। बीच में ठेंगहा घाट तिलयुगा नदी में पड़ता है। स्वामी जी के साथ भजनियों का दल भी था।

नदी को पार करने से पहले घटवार ने घटवारी वसुल करना प्रारम्भ कर दिया। बाबा जी ने हास्य में कहा- ''बाबा जी को पैसा कहाँ से आयेगा कि घटवारी देगा। घटवार ने कर्कश आवाज में कहा- ''ऐसे-ऐसे बहुत से बाबजियों को मैंने देखा है। पेट पूजा तथा लोगों को धोखा देने के लिए बहुत से धूर्त ऐसा रूप बना लेते हैं। साथ के सज्जन ने घटवारी देना चाहा पर बाबा जी ने रोक दिया और कहा- ''मैं बिना शुल्क दिये नहीं जाता, केवल हँसी की थी। कुछ काल समाधिस्थ हो भजनियों से कहा- ''मैं आगे चलता हूँ, तुम लोग मेरे पीछे आओं। किसी ने चिल्लाकर कहा- महाराज पानी अथाह है। बाँस भी थाह नहीं लेता। सब के सब डूब करेंगे। बाबाजी ने उत्तर दिया- ''इसीलिए तो पीछे-पीछे आने के लिये कहता हूँ। जब मैं डूबने लगूँगा तब तुम लोग अपने को बचा लेना। सबों ने आज्ञा मानी। आगे-आगे बाबा जी और पीछे-पीछे अन्य लोग सभी आसानी से पार हो गये। केवल ठेहुना भर पानी हुआ। घटवार आश्चर्य चकित हो दौड़कर पाँव पर गिर गया और कहा- ''बाबा मैंने आपको नहीं पहचाना। क्षमा करें, मैं गरीब घटवारी हूँ। बहुत रूपये लगे हैं। किस्ती बन्द हो जाने से मैं कहीं का नहीं रहूँगा। आप साधु दयालु होते हैं।

स्वामी जी ने कहा- ''धाखेदार बाबा जी से क्या हो सकता है? जो होना था हो गया। नाव उठाकर दूसरी जगह ले जाओ। अब यहाँ नाव नहीं चलेगी। स्वामी जी दलबल के साथ चले गये। तब से लेकर आज तक लोग इस नदी में पैदल ही पार होते हैं। ठेहुना भर पानी से कभी ज्यादा नहीं हुआ।


जगन्नाथ जी का पट बन्द

एक बार स्वामी जी पर्यटन करते हुए अपने दलबल के साथ जगन्नाथपुरी पहुँचे। नित्य कर्म से निवृत हो भजनी के साथ प्रात: कालीन कीर्तन करने जगन्नाथ जी के मंदिर पहुँचे। ज्यों ही ढोलक पर थाप पड़ी, त्यों ही पंडे लोग रोकने के लिये जुट गये। उन्होंने स्वामी जी से कहा- ''यहाँ ढोल-ढाक बजाने का नियम नहीं है। इसे बन्द कीजिये।

स्वामी जी बहुत समझाये, पर पंडे लोग अपनी डफली बजाते ही रहे। अन्त में स्वामी जी के जाते ही जगन्नाथ जी का पट स्वयं बन्द हो गया। अब पंडे लोगों में तहलका मची। पट खोलने का सारा प्रयास विफल हुआ। सबों ने निश्चय किया कि बाबा जी को हटाने का दुष्परिणाम है। सब मिलकर स्वामी जी के पास पहुँचे। वे कीर्तन में मग्न थे। सरदार पंडा उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े थे। स्वामीजी की नजर तो उन पर पड़ी किन्तु भजन समाप्त नहीं हुआ था इसलिये कुछ नहीं पूछ सके। भजन समाप्त होने पर स्वामी जी ने पूछा- ''क्यों खड़े हैं? क्या चाहिये? पंडे ने कहा- आपके आने के बाद ही जगन्नाथ जी का पट आप से आप बन्द हो गया। भोग-राग सब बन्द है। आप वहीं चलकर कीर्तन करें। हमलोग आपको पहचान नहीं पाये। इसलिए ऐसी भूल हो गर्इ। आप क्षमा करें ''क्षमासाराहि साधव:।

भोग-राग का बन्द होना सुनकर स्वामी जी ने तुरंत भजनियों को वहीं चलने का आदेश दिया। मंदिर में कीर्तन प्रारम्भ होते ही पट स्वयं खुल गया। साथ ही सबों के âदय कमल भी खिल गये।