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जय बाबा जी

अखण्ड मंडलाकरं व्याप्तं येन चराचरम्तत्पदं दर्शितं येन तस्मैं श्री गुरुवे नमः ।।१।।
रविः वाह्य तमो हन्ति चान्तध्र्वान्तं महागुरुःतस्माल्लक्ष्मीपतिं वन्दे हृदयस्थ दिवाकरम् ।।२।।

प्रातः स्मरणीय गोस्वामी लक्ष्मीनाथ परमहंस का जन्म जिला सुपौल के परसरमा गाँव में विक्रम संवत् 1850 (1793 ईo सन 1200 साल) में हुआ था।

उनके पिता का नाम पंडित बच्चा झा था। वे कुजीलवार दिगौन मूल और कात्यायन गोत्र के मैथिल ब्राह्मण थे। बचपन में आप कुछ समय तक श्री कृष्ण की तरह गौ सेवा में रहे। पीछे उपनयन संस्कार संस्कार से संस्कृत हो, महिनाथपुर के ज्योतिषी पंडित श्री रत्ते झा के पास ज्योतिषी शास्त्र अध्ययन करने के लिए गए। कुछ समय तक उन्होंने अध्ययन किया।

पंडित रत्ते झा तंत्र शास्त्र के पूर्ण ज्ञाता ही नहीं, सफल साधक भी थे। उनकी उत्कट अभिलाषा देख, पंडित जी ने तंत्र शास्त्र की शिक्षा एवं साधना पर अग्रसर होने में काफी सहायता पहुँचायी। अपने गुरु की कृपा से, कुछ कालों में ही अच्छी योग्यता प्राप्त कर ली। गुरु के विरुद्ध मुसलमानों द्वारा लगाए गए अभियोग में अपने तंत्रबल से गुरु को मुक्त कर, तंत्र परीक्षोत्तीर्ण हुए। शव - साधना से गुरु भाई को भी उत्तीर्ण कराये। अध्ययन समाप्त कर, गुरु को दक्षिणा दे, उनसे अमोध आशीर्वाद लेकर लौट आये।

उनके माता - पिता को बाबाजी के चेहरे पर एक अजीब उदासीनता की छाप मालूम पड़ी। उदासीनता को मिटाने के लिए उन लोगो ने बाबा जी का विवाह कर देना अच्छा उपाय सोचा। यद्यपि वे विवाह करना नहीं चाहते थे। विवाह को अपनी भावी साधना के लिए प्रबल बाधा समझते थे। किन्तु भावी शुभ संकल्पित मार्ग में माता - पिता की आज्ञा का उल्लंघन भी तो धर्म विरोधी विकट विघ्न था। वे इस प्रकार के मानसिक द्वन्द में कुछ काल तक किंकर्तव्यमूढ़ रहे। अंत में धर्म की ही विजय हुई। माता - पिता की आज्ञा शिरोधार्य कर उन्होंने कहुआ ग्राम के शोखादत्त ठाकुर की सौभाग्यवती कन्या का पानी - ग्रहण किया। गृहस्थी में उनका मन नहीं लगा। बचपन से ही उनको योगाभ्यास करने की प्रबल इच्छा थी। किन्तु योग्य गुरु नहीं मिलने के कारण वे उनकी खोज में निकल पड़े।

जंगल में भटकते हुए सौभाग्य से योगिराज लम्बानाथ जी से उनकी मुलाकात हो गई।
उनकी प्रबल आकांक्षा एवं पात्र शिष्यत्व की योग्यता देख योगिराज श्री लम्बानाथ ने बाबा जी से पूछा :- तुम्हारा क्या उद्देश्य हैं ?

बाबा जी - मैं एक योग निष्णात गुरु की खोज में निकला था। ईश्वर ने दया करके उनसे मिला दिया।

साधू - योग से क्या काम ?

बाबा जी - बचपन से ही मुझे योग सिखने की प्रबल इच्छा हैं। इसलिए मैं योगी गुरु चाहता हूँ।

साधू - कलियुग में योगाभ्यास कठिन प्रयास हैं। इस युग में भगवत कीर्तन ही मुख्य विषय हैं। "कलौ केवल कीर्तनम् कीर्तनीयो सद हरिः।।"

बाबा जी - यह बात सही हैं। किन्तु, "योगाभ्यास कठिन हैं," इसे मैं ह्रदय में स्थान देना चाहता। इससे पुरुषार्थ का अपमान होता हैं।

साधू - मेरी सलाह सुनो तो योग को छोड़ भक्ति की ही शरण लो।

बाबा जी - भक्ति तो सेवनीय है ही किन्तु मेरा विश्वास है कि श्रीमान जैसे उदार गुरु यदि इस दीन योगजिज्ञासु को अपना लें तो योगाभ्यास कठिन नहीं, सरलतम हो जायेगा।

साधू - देखो यह गहन वन हैं, यहाँ खाने - पीने का कोई प्रबन्ध नहीं हैं। तुम अन्न भोगी जीव हो। विश्राम का ठिकाना नहीं। हिंसक जन्तुओं से जंगल भरा पड़ा हैं। यहाँ रहना खतरे से खाली नहीं। अपने ही देश जाकर किसी योगी से शिक्षा लेकर अभ्यास करना।

बाबा जी - अब देश में योगी कहाँ पावें ? अगर वहाँ योगी मिलते तो इस प्रकार पर्वत और जंगल की ख़ाक क्यों छानते ?

साधू - तुम्हारा घर किस देश में हैं ?

बाबा जी - मिथिला में।

आश्चर्य चकित होकर साधू ने कहा :- "क्या तुम मिथिलावासी हो ? वहाँ अब योगी नहीं मिलते ? याज्ञवल्क्य केजन्मभूमि की यह हालत ? जहाँ से संसार अध्यात्म विद्या की शिक्षा लेता था, जहाँ के राजा भी महायोगी होते थे, वहाँ अब योगी का मिलना दुर्लभ ?" "कालोहि दुरती क्रमः" युवक क्या यह सच कह रहे हो ?

बाबा जी - गुरुदेव ! मैं सच कह रहा हूँ। एक-दो कहीं छिपे हों तो नहीं कह सकते मगर प्रगट रूप में तो उनका सर्वथा अभाव ही हैं। साधू कुछ समय तक किंकर्तव्यविमूढ़ रहे और अन्त में बोले "वत्स ! मैं तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार करता हूँ।"

साधू ने पूछा - "युवक तुम्हारा नाम ?"

बाबा जी ने उत्तर दिया - "लक्ष्मीनाथ झा"

साधू - "झा" शब्द का क्या अर्थ ?

बाबा जी - हमलोग, उपाध्याय वंश के हैं। उपाध्याय का अपभ्रंश "ओझा" और ओझा का अपभ्रंश "झा" रह गया हैं। साधू ने मुस्कुराते हुए कहा - ज्यों - ज्यों विद्या घटती गई होगी त्यों - त्यों उपाधि भी घटती गई। न जाने यह झा कहाँ विश्राम लेगा। फिर बाबा जी की ओर मुड़कर बोले - युवक ! मदन उपाध्याय को जानते हो ?

बाबा जी - वे सदगति प्राप्त कर चुके हैं। उनके नाम और यश से परिचित हूँ।

साधू - वे अच्छे तांत्रिक और "भैया" के भक्त थे। यह कह कर साधू नित्य कर्म करने चले गये।

बाबा जी प्रसन्न होकर आश्रम में रहने लगे। एक दो बार गुरु की अनुमति से कन्दरा के भीतर भी गये किन्तु कोई विशेषता नहीं पायी। हर बार उन्होंने दो साधुओं को समाधिस्थ पाया। कन्दरा के अन्तर्गत दो समाधिस्थों में प्रथम अतिवृद्ध गुरु गोरख नाथ तथा दूसरे वृद्ध उनके शिष्य थे। साधू (लम्बानाथ) गोरख नाथ के शिष्य के शिष्य थे।

आरम्भ में साधू सही लम्बानाथ ने उनको योग साधना की प्राथमिक क्रियाये बतलायी। फिर शरीर शुद्धि, अंगन्यास मुद्राये, आसन और प्राणायाम के भेद तथा उनके साधन के नियम बतलाये। तदन्तर अष्टांग योग की शिक्षा देकर उनकी सिद्धि करने की बिधि बतलाई। इसके बाद समाधिपाद, साधनपाद, विभूतिपाद तथा कैवल्यपाद आदि चतुष्पदों का ज्ञान कराकर उनके साधनाओ के नियम बतलाये। इस प्रकार योगिराज श्री लम्बानाथ ने छः महीनों में ही योग के सभी आवश्यक विषयों का ज्ञान कराया और उनके साधनों में सफलता भी दिलाई। फिर गुरु ने स्वदेश लौट जाने एवं भगवत भजन की आज्ञा दी। योग स्नातक उन्होंने पत्र, पुष्प, फल और जल दक्षिणा में देकर योग विद्या का समावर्तन किया एवं गुरु से आशीष प्राप्त किया। निःस्वार्थ, निर्लोभ, विरक्त एवं दयालु गुर ने दक्षिणा स्वीकार कर प्रेम प्लावित ह्रदय से आपको आशीर्वाद दिया और शीर्षाध्राण किया। इस प्रकार योग बल से ३५ कला के पूर्ण ही गुरु जी ने उनको अभीष्ट स्थान (दरभंगा) भेज दिया।

उन्होंने अपने घर से अन्यत्र रहुआ गाँव के एक पीपल वृक्ष के निचे अपना साधना स्थान चुना। वर्षों की कठिन तपस्या से अभिलाषित दक्षता प्राप्त कर परिब्राजक के रूप में प्रसिद्ध-प्रसिद्ध स्थानों में घूमने लगे। राजा - महाराजाओं के यहाँ से बुलाहटे आने लगी किन्तु वे कहीं जाना पसन्द नहीं करते थे। जिनका विशेष आग्रह और प्रेम देखते थे, आप वहाँ जाते भी थे।

बनगाँव के और्जस्वल (पहलवानी) युग में परिब्राजक बाबाजी यहाँ पधारे। उस समय वे संन्यास ग्रहण कर शिखा सूत्र को तिलांजलि दे चुके थे। उनका ऊर्जस्वी तथा गठित स्वास्थ्य देखकर क्या युवा क्या वृद्ध सबों ने हर्ष पूर्वक बनगाँव में बाबा जी का स्वागत किया। स्वागत इसलिए नहीं की वे महान साधू या योगी थे अपितु उन लोगों का विश्वास था कि अगर बाबाजी को अच्छी तरह से खिलाया - पिलाया गया तो वे एक अच्छे पहलवान निकलेंगे। बाबाजी भी अपने गुणों को प्रगट नहीं करना चाहते थे। वे ग्रामवासियों के साथ घुल - मिल गये। चिक्कादरबर (कबड्डी), खोरि चिक्का, छूर-छूर आदि देहाती खेलों में वे अच्छे खिलाड़ी समझे जाते थे।

उस समय बनगाँव में दूध - दही का बाहुल्य था। एक धनी-मानी सज्जन (श्री कारी खाँ) ने बाबाजी को दूध पिने के लिये एक अच्छी दूध देने वाली गाय दे दी थी। गाय को खिलाने - पिलाने का भार बाबा जी पर नहीं था।

बाबा जी के लिये ग्रामीणो ने ठाकुरवाड़ी के प्रांगन में एक पूर्ण कुटी बनबा दी थी। अधिक से अधिक समय बाबाजी बनगाँव में ही रहते थे। इसलिये नहीं नहीं कि वे खेल और पहलवानी को अधिक पसंद करते थे, बल्कि इसलिये की यहाँ के लोग बहुत सीधे - साधे और साधु - महात्माओं को बड़ी श्रद्धा की दृष्टि से देखते थे। दिन भर वे उनलोगों के साथ रहते थे और रात में योगाभ्यास किया करते थे।

बनगाँव में ही बाबाजी को "विभूतिपाद" की रश्मि विकसित हुई। अनुमानतः 1819 ईo से उन्होंने ब्रजभाषा और मैथिली में कविता लिखना प्रारम्भ किया। अधिकतर वे दोहा, चौपाई, और गीत लिखा करते थे। बाबा जी के समकालीन कवि श्री छत्रनाथ झा, मिस्टर जॉन, और रामरूप दास थे। एक बार कवि छत्रनाथ झा जी ने बाबा जी की कविता में मात्रा दोष पर अपनी अभिव्यक्ति दी। बाबा जी ने आशय समझ कर प्रत्युत्तर में कहा - "इसका परिणाम यही कि मेरा अनिष्ट होगा। मैं एक संन्यासी हूँ, संन्यासी को वंश से क्या प्रयोजन, उसे तो भगवत भक्ति चाहिये।

बाबा जी ने अपने जगहों में भगवान के मंदिर के साथ - साथ अपनी कुटिया भी स्थापित की। जिसमे बनगाँव,परसरमा, फैटिकी, लखनौर एवं शक्रपुरा आदि स्थानों की कुटियाँ अधिक प्रसिद्ध हैं। जमीन्दारी समाप्ति के पूर्व तक, इस कुटियों का भरण - पोषण शक्रपुरा राज्य से हुवा। बाबा जी ने अनेक स्थानों में पोखरों, कुओं, और फुलवारियों की भी सृष्टि की।

लोग उनकी अद्दभुद योग शक्ति का प्रभाव देख कर बाबा जी को योगी विशेष का अवतार समझने लगे। रोगियों और बन्ध्याओं का ताँता बन्धने लगा। लोग उनकी अमोध वाणी से लाभ उठाने लगे। बाबा जी यथासाध्य सबका दुःख दूर किया करते थे।

प्रेम से बोलिये "श्री श्री १०८, श्री बाबा लक्ष्मीनाथ गोसाई" की जय